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सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

.'बस यूँ ही'..............



गर पढ़ो तुम जो  तरन्नुम में.....ग़ज़ल होती है
इसमें कुछ बात मोहब्बत की....बयाँ होती है !
और अल्फाज़ भी होते हैं कभी....तल्खी लिए
चोट दिल पर करे कोई तो......अयाँ होती  है !

इसमें कुछ शख्स भी शामिल हैं यारों..'बस यूँ ही'
कोई  आशिक  तो  कोई  बज्मे रवाँ...'बस यूँ  ही' !
अश्क और इश्क से बरकत है बज़्म....'बस यूँ ही'
ये बज़्म मेरी दिल अज़ीज़ मुझको......'बस यूँ ही' !

मेरी महफ़िल है.....नज़्म मेरी......शम्मा,परवाने
न जाने क्यूँ.......तुझे न भाए......हम न ये जाने ?
तुझको आदत है भटकने की यूँ....महफ़िल-महफ़िल 
शमाँ जली मेरी......क्यूँ उस पर नज़र......परवाने ?  

खुदा के नूर से....रौशन है आज....बज़्म मेरी
सभी का करती...एहतिराम है ये....बज़्म मेरी !
है एतबार...इंतज़ार....इन्तिखाब......'उसका'
उसके आफ़ताब से....पुरनूर है ये....बज़्म मेरी !

न इसमें गम है.....न एहसास बदगुमानी का
न बददुआ ही......न एहसास है तकब्बुर  का !
रहे पुरनूर ये महफ़िल......खुदा की नेमत है
भरोसा मुझको है ....मेरे खुदा की बरकत का..!

18 टिप्‍पणियां:

  1. नज़्म इतनी मार्मिक है कि सीधे दिल तक उतर आती है।

    कुछ कठिन शब्दों (जैसे तकब्बुर) के अर्थ दे देतीं तो हम जैसे आम पाठकों को और भी समझ में आती।

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  2. थोड़ा कठिन हो गयी शब्दावली..समझते हैं धीरे धीरे..

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  3. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर की गई है। चर्चा में शामिल होकर इसमें शामिल पोस्ट पर नजर डालें और इस मंच को समृद्ध बनाएं.... आपकी एक टिप्पणी मंच में शामिल पोस्ट्स को आकर्षण प्रदान करेगी......

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  4. प्रवीण जी ने सही कहा है ... कुछ शब्दों के अर्थ समझने होंगे ....पर फिर भी सार समझ आ रहा है ...
    खुदा की बरकत में ही भरोसा होना चाहिए ... किसी को ज़बरदस्ती अपनी बज़्म में नहीं बुला सकते

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  5. ये उम्दा पोस्ट पढ़कर बहुत सुखद लगा!
    प्रेम दिवस की बधाई हो!

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  6. भरोसा भी खुदा की नेमत ही है..उम्दा नज़्म..

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  7. बेहतरीन नज़्म...
    दाद कबूल करें...

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