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शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

इबादत



ऐसे भी नादान हैं जो इंसान के आगे रोते हैं,
हमने अपना रोना अब इंसान के आगे छोड़ दिया !!
जो देता है, जो लेता है, जाने बूझे वही खुदा,
खुद को सौंप खुदा को, यूँ दुःख–दर्द  का दामन छोड़ दिया !!
सबने अपनी–अपनी कह दी, लेकिन हम चुप-चाप रहे,
क्या कहना? क्या सुनना? उस बेदर्द का दामन छोड़ दिया !!
बदले सारे रिश्ते–नाते न  शिकवा ,न कोई गिला,
जब से मिला खुदा मुझको, संसार का दामन छोड़ दिया !!

9 टिप्‍पणियां:

  1. जब खुदा ही मिल जाए तो क्यों किसिई और से वास्ता रहे....
    जब धेनु सामने हो तो आक के दूध से क्या सरोकार...
    बहुत बढ़िया...

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  2. thanx mam 4 visiting and aprctng
    asha krta hu apke sanidya me aur asirvad se kuch behtar kr sku.........

    kya khna?kya sunna?us bedard ka daman chhod diya

    rly hrt touching

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  3. जी सही किया आपने.
    हम तो साईं भक्त हैं.सब उन्ही पर छोड़ देते हैं.

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  4. पूनम जी,बहुत ही सच है आपकी कविता में.दर्द भी है.
    जब उस रब का सहारा मिल जाए तो बेदर्द दुनिया की जरूरत किसे रहती है.
    आप की कलम को शुभ कामनाएं

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  5. पूनम जी,
    ऐसी कवितायेँ ही मन में उतरती हैं ॥

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