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शुक्रवार, 3 अगस्त 2012

मेरे पास.....





रात की खामोशियाँ बेचैन कर देती हैं जब 
बेखुदी में यूँ ख्याल बन बन के आ जाते हो तुम....!

तेरे आने का नहीं अब मुझको रहता इंतज़ार
मेरे ख़्वाबों में कभी भी यूँ चले आते हो तुम....!

बाद मुद्दत के कभी गर मिल गए हम तुम कहीं
मैं तुम्हें पहचान लूंगी कैसे पहचानोगे तुम....!

है अनोखा तुझसे रिश्ता कोई ये जानेगा क्या
साथ न हो कर भी मेरे पास ही रहते हो तुम....!




12 टिप्‍पणियां:

  1. मैं तुम्हें पहचान लूंगी कैसे पहचानोगे तुम ?

    वाह जी वाह
    ऐसे कैसे नहीं पहचान पायेगा किसी बेचारे पर तोहमत लगाना अच्छी बात नहीं हाँ :)

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  2. अपने मनोभावों को बहुत सुन्दर शब्द दिए हैं...सुन्दर रचना..

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  3. यादों में होने का भाव जो छिपा रहता है।

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  4. .

    … क्या कहूं आपके इस रंग के लिए !
    बस …
    काश ! काश ! काश ! जैसे भाव प्रतिक्रिया में आ रहे हैं
    एक के बाद एक …

    काश ! …
    काश ! … …
    काश ! … … …
    काश ! … … … …

    और सबसे बड़ा काश यह कि -
    काश ! ऐसी ख़ूबसूरत रचना हम भी लिख पाते … … … !

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  5. सुन्दर तस्वीर के साथ सुन्दर अहसास......जज़्बात पर कुदरत के नज़ारे भी देखें।

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  6. मन से पास होने का अहसास ही
    पास होने की खास पहचान करा सकता है.

    सुन्दर भावमय प्रस्तुति.

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  7. मन से पास होने का अहसास ही
    पास होने की खास पहचान करा सकता है.
    ati sundar..bahut khoob.

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