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बुधवार, 29 अगस्त 2012

कुछ अनकहा सा......





कुछ  अनकहा  सा .....

कई बार  मन में
शब्द उमड़-घुमड़ के
जुड़ते से चले जाते हैं
अपने आप ही,
और अनजाना सा अनमना सा 
कुछ बन जाता है अपने आप ही..!
मन चाहता है कि उतार दे
मन की बातों को कहीं...
कभी लिख कर..
या फिर कम से कम
किसी से share ही कर लें....!
लेकिन न वो पन्ने मिलते हैं
जिस पर हम लिख सकें...
और न वो शख्स ही....
जिससे हम मन की बातें कह सकें...
और सब अनलिखा,अनकहा सा
बहुत कुछ रह जाता है 
हमारे साथ ही....!! 



8 टिप्‍पणियां:

  1. लेकिन न वो पन्ने मिलते हैं
    जिस पर हम लिख सकें...
    और न वो शख्स ही....
    जिससे हम मन की बातें कह सकें...

    अक्सर ऐसा होता है।

    सादर

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    उत्तर
    1. यशवंत...
      आपके प्रत्युत्तर में ही लिखा था कभी...!
      आज एकाएक नज़रों के सामने से गुजरी रचना तो पोस्ट कर दी...!
      मित्र भी कैसे कैसे मदद कर जाते हैं....! :))
      धन्यवाद...!!

      हटाएं
  2. सच .... बहुत कुछ रह जाता है अनलिखा ....

    उत्तर देंहटाएं
  3. हवाओं में बिखर कर.. अति सुन्दर..

    उत्तर देंहटाएं
  4. सच कहा है ... बहुत ,मुश्किल से सच्चा दोस्त मिलता है ...
    लाजवाब लिखा है ... भाव पूर्ण ...

    उत्तर देंहटाएं
  5. ......और सब अनलिखा,अनकहा सा
    बहुत कुछ रह जाता है!......

    वाह! पीडा न कह पाने की और न सुने जाने की भी!
    सुन्दर चित्रण!

    उत्तर देंहटाएं