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गुरुवार, 16 अगस्त 2012

क़त्ल........



क़त्ल........

कई बार हमारे ज़ज्बातों का 
क़त्ल हो जाता है किसी के हाथों 
और न हम इलज़ाम दे पाते हैं,
न कातिल को ही इल्म होता है
कि उसने क़त्ल किया है,
और कई बार मालूम होने पर भी 
ज़िम्मेदारी लेने को तैयार भी नहीं होता है...
क्यूँ कि वो ज़ज्बात हमारे होते हैं..
उसके नहीं....!
हाँ,अपने ज़ज्बातों का ढिंढोरा 
वो सारे जहाँ में ज़रूर बजा आता है...!!
और ज़ज्बातों का क्या है......
वो खामोश ही रहते हैं....
हाँ,मरते वक़्त ज़रूर 
हमें हैरत भरी नज़र से देखते हैं 
कि हमने ऐसा होने क्यूँ दिया...!!




8 टिप्‍पणियां:

  1. क्या कहूँ पूनम जी....
    तो फिर क्यूँ न सहेजा जाए जज्बातों को....किसी कातिल की निगाहों से दूर....

    सस्नेह
    अनु

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  2. जज्बातों से खेलना तो उनका काम था..
    हम ही खुद को ना बचा पाए..
    ह्रदय द्रवित करती रचना..

    उत्तर देंहटाएं
  3. दी बहुत गहन और खुब्सु५रति से जज्बातों के काट का बयां किया है.....हैट्स ऑफ इसके लिए।

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