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मंगलवार, 15 फ़रवरी 2011

काश............


  

चाँद  तारों  से  भरे  
खुले  आसमान  के  नीचे ...
एक-दूसरे  के
हाथ  में  हाथ  डाले,
हरे  भरे  मैदान  में
बहुत  दूर  तक .....
निकल  जाए  हम  कभी,
चुपचाप  चलते-चलते !!


7 टिप्‍पणियां:

  1. प्रिय पुनम जी
    सादर सस्नेहाभिवादन !

    निकल जाएं हम कभी
    चुपचाप चलते चलते …


    क्यों नहीं … मौसम भी है , मौका भी ! :)
    संक्षिप्त , लेकिन सुंदर रचना … बधाई !


    प्रेम बिना निस्सार है यह सारा संसार !
    ♥ प्रणय दिवस की मंगलकामनाएं! :)

    बसंत ॠतु की भी हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !

    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  2. संक्षिप्त मगर सुन्दर अभिव्यक्ति.

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