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मंगलवार, 10 जनवरी 2012

डायरी का ये अनछुआ पन्ना..........

डायरी का ये अनछुआ पन्ना...कितने दिन पहले लिखा गया था लेकिन आज के परिवेश में भी उतना ही मायने रखता है और सही बैठता है जितना कि उस समय जब कि मैंने अपने मन के झंझावात में इसे अपने इर्द-गिर्द महसूस किया था और अनजाने ही लिख गयी थी...! कुछ लोग उस समय भी मेरे साथ थे और आज भी हैं मेरे साथ ही....जो मेरी उस मन:स्थिति में मेरे बराबर के साझीदार रहे हैं ! 'आज' जो भी है...बेहतर ही है....जीवन की बहुत सी 'गुल्थियाँ'  अपने आप से सुलझती जातीं हैं....बस ज़रुरत होती है हमें 'धैर्य' रखने की....क्यूँ कि समय भी देखता है कि आप कब तक नहीं टूटते..........  
और फिर...... 
                                                     
                        


स्थान.......खतौली(देहरादून)
दिनांक.....२९ अक्टूबर, २००७
                                  
                     बाहर कुहासा ही कुहासा है लेकिन भीतर का कुहासा छंटता सा दीखता है ! न ! ये शरीर की ऑंखें नहीं हैं जो इसे देख सकें...इसे देखने के लिए आँखों की ज़रुरत ही नहीं है ! बस महसूस करने और 'होने' की ज़रुरत है !  ये 'होना' जो अब तक असंभव लगता था....अब बस 'है' ! ये कैसे हुआ ?  क्यों हुआ ?? और किससे हुआ ???..न जानने की ज़रुरत है और न समझने की ! बस हो गया....यही एहसास ज़रूरी है और सच कहें तो यह भी ज़रूरी नहीं है....ज़रूरी है तो बस 'है' !......'होना' !!
                                    क्यूँ नहीं हम किसी उड़ती चिड़िया के पंखों को देखकर खुश हो पाते, क्यूँ उसकी चहचहाहट को enjoy  नहीं कर पाते, पत्तों की खडखडाहट, उनकी भीनी  सी  सुगंध  को  महसूस कर पाते, जमीन पर उगी दूब  पर दूर तक पसरी ओस की बूँदें हमें ठंडक क्यूँ नहीं दे पातीं, धीमी हवा के एहसास से हिलते हुए पेड़ के कुछ पत्ते हमारे दिल को क्यूँ नहीं गुदगुदा पाते, क्यूँ सड़क के किनारे खड़े एक छोटे से बच्चे की नाक पोंछती मुस्कराहट हमारे चेहरे को एक मुस्कान दे पाती......???  दरअसल हमने वो  दृष्टि  ही खो  दी है, लोगों की भीड़ में हमें रहने की आदत हो गयी है हर वक़्त, एक बंधे-बंधाये  ढर्रे से जीने की  आदत हो गयी है हमें ! या तो सिर्फ काम-काम-और काम ! या सिर्फ वही भीड़, वही लोग, वही चेहरे, वही फूहड़ सी बातों पर हँसना, वही किसी के शरीर को छू कर खुश होना, भीतर ही भीतर कुछ अनजानी सी सनसनाहट महसूस करना या फिर अपने हिसाब से उस ठन्डे से स्पर्श में गर्माहट का एहसास करना...और भी न जाने क्या-क्या...??  समाज का ये पहलू भी किसी से अनछुआ नहीं है.....अपने इर्द-गिर्द कुछ ऐसे ही लोगों को महसूस कर रही हूँ आजकल ! सब कही न कहीं कुछ खोज रहे हैं...हर रिश्ते में कुछ लेने-देने का सम्बन्ध जुड़ गया है.....भले ही वह किसी भी स्तर पर हो...! किसी को किसी से कुछ भौतिक स्तर पर चाहिए, तो किसी को किसी से भावनात्मक स्तर पर या फिर शारीरिक स्तर पर भी....यहाँ तक कि किसी के शरीर को छूना भी तभी आनंद देता है जब उस छुअन से शरीर में कुछ अनजानी सी हरकत हो....!!
                                      अचानक अजीब सी लगने लगी है ये दुनिया ! यहाँ हर चेहरा दूसरे चेहरे से अनजाना है, हर मन दूसरे के मन से भिन्न है फिर भी लोग अपने हिसाब से एक-दूसरे में अपनी तरह के लोग खोजने में लगे हुए हैं ! क्या खोज रहे हैं..यह उन्हें भी नहीं मालूम ! क्यूँ खोज रहे हैं...ये भी नहीं मालूम और कब तक ये खोज जारी रखेंगे.....ये तो शायद उन्हें कभी भी मालूम न हो सके ! हर कोई दूसरे से तभी जुड़ रहा है जब वहां उसे कुछ मिलता सा दीखता है...अकेले होने की आदत, जरा देर के लिए भी अपने साथ रहने की आदत छुट सी गयी है ! खुद के साथ अकेले रहने में उन्हें डर सा लगने लगा है....हमेशा चाहिए कि कोई उनके किये को देखे, कोई प्रशंसा करे....शायद लोग दोस्त भी इसीलिए बनाते है कि उनके होने का एहसास कराने वाला कोई उन्हें अपने अगल-बगल हर समय चाहिए...!! कभी किसी को गिफ्ट भी देते हैं तो कहीं अपने अन्दर "कुछ दे सकते हैं" की भावना को पोषण मिलता है..! सिर्फ देने के लिए या यूँ ही देने के लिए किसी के हाथ नहीं उठाते शायद यहाँ मैं जो कहना चाह रही हूँ...सही शब्द नहीं हैं मेरे पास !
                            कुछ अजीब सा लगने लगा है सब सोच कर...या यूँ कहें अब अजीब भी नहीं लगता....कुछ अपने भीतर, कुछ अपने ही साथ होने का एहसास ज्यादा से ज्यादा होने लगा है...!! इतने सालों में जो किया, जितना भी किया, जब वही सब धुल-पुंछ गया...फिर किसके लिए, किसलिए और क्यूँ...!!  इतने सालों से यही सब तो किया, प्यार, केयर जैसे शब्द केवल सुने ही नहीं जिए भी खुद, लेकिन आज लगता है अगर इतना जीने के बाद भी अगर हम वहीँ के वहीँ हैं तो अपने साथ न्याय नहीं कर पाए हम !! वहीँ के वहीँ अटके रह गए, दूसरे तो अपना-अपना देखते रहे और हम भी उनका मुँह...!!     
                      अभी सबके साथ हो कर भी "हूँ",अपने साथ "हूँ" और अकेले में भी "हूँ" !  बाहर का  कुहासा घना हो तो कुछ भी नहीं दीखता लेकिन जब मन की आँखें खाली हों...न आंसू हों और न ही धुंधलका ...तो सब साफ़-साफ़ नजर आने लगता है ! बाहर के कोहरे को पार करने के लिए या आगे कदम बढ़ाने के लिए किसी के साथ की, किसी के हाथ की ज़रुरत होती है....लेकिन जब दूरी भीतर की तय करनी हो तो न किसी सहारे की ज़रुरत होती है और न ही ज़रुरत होती है कदम बढ़ाने की.........!!!  



7 टिप्‍पणियां:

  1. मन,
    निश्चल,शीतल,निर्मल
    पावन,पवित्र,बच्चे
    सा होता
    चेतन,अचेतन अवस्था
    में रहता
    कभी विचलित
    कभी प्रफ्फुलित होता
    कोई मसोसता
    दोष किस्मत को देता
    किसी का चंचल
    बंधन निरंतर तोड़ता
    कोई भरोसा उस पर
    रखता
    फैसले उसके कहने से
    करता
    किसी का पंछी सा
    उड़ता
    प्रेम में डूब,सुध बुध
    खोता
    चोट खाकर आहत
    होता
    किसी का चुपचाप
    सहता
    मन किसी का विश्वाश,
    किसी का अंध विश्वाश
    से भरा
    कोई बेमन,
    कोई अल मस्त
    जीता
    किसी का अहम्
    से भरा
    किसी का प्यार से
    पिघलता
    व्यथित,औरों के दुःख में
    होता
    मन के भी,मन होता
    होगा
    कभी हंसता,कभी रोता
    होगा
    मेरा मन बावरा
    निरंतर नया करता
    कुछ ना कुछ लिखता
    रहता
    मन तो आखिर
    मन है
    दिखता नहीं,फिर भी
    बस में नहीं
    रहता
    08-01-2011

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  2. अभी सबके साथ होकर भी 'हूँ', अपने साथ हूँ .....अकेले में भी हूँ
    बहार का कुहासा घना हो तो कुछ भी नहीं दीखता. ...लेकिन जब मन कि आँखें खाली हों न आँसू हों ...और न ही धुंधलका तो सब कुछ साफ साफ़ नज़र आने लगता है !!..................
    ..............
    लेकिन जब दूरी भीतर तय करनी हो तो न किसी सहारे कि जरूरत होती है न ही जरूरत होती है कदम बढ़ाने की....
    ....
    वाह पूनम जी बहुत बहुत आभार आपका ...एक मार्गदर्शक प्रस्तुति के लिये !

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  3. कभी थोड़ी पीड़ा सह ली जाये तो समस्या अपने आप जाने लगती है।

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  4. अपने अंतर्यात्रा में बस होशपूर्ण साहस करने की जरुरत होती है .सुन्दर लिखा है .

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  5. आपकी प्रस्तुति आपके हृदय की दार्शनिकता को उजागर कर रही है.
    भावुकता के साथ सोचने को भी मजबूर कर रही है.
    अपने भावों और विचारों को सांझा करने के लिए आभार,पूनम जी.

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  6. waise punam ji, sach kahiye to jeewan jeene ka achcha aor vyawharik tareeqa un "doosre logon" wala hi hai.. ganda hai par achcha hai ye.. kya karen, kori bhawukata se kuchh nahi haasil hota..siwai dard ke..

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