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गुरुवार, 5 जनवरी 2012

या खुदा........




करके  बदनाम  मुझे  वो  हुए  हैं  यूँ  बेज़ार !
जो  है  जालिम वो मुझे किस तरह वफ़ा  देगा !!

नासमझ  मैं,यूँ  करती रही एतबार-ओ-यकीन ! 
न  समझ  पाई  मुझे  वो  भी  यूँ  दगा   देगा !!

उसकी  बातों  ने  किया है मुझे यूँ  कत्ले  आम !
मेरा  कातिल  क्या  मेरे  हक में  फैसला देगा  !!

उठा के हाथ कभी मागूँ  भी तो  क्या मागूँ !
मेरा    पर्वर्दगार     मुझको     हौसला    देगा !!


या खुदा ! बक्श  दे  मुझको मेरे  इन  रफ़ीकों से  ! 
कभी  तो  तू  भी  मेरे  हक  में  फैसला  देगा  !!

०५-०१-२०१२



11 टिप्‍पणियां:

  1. क्या बात है....बेहद खूबसूरत गजल!


    सादर

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  2. वाह बहुत सुंदर पहले ही शे'र में ढेर कर दिया आपने !
    बहुत खूब, सुंदर रचना !

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  3. बहुत ही सुंदर गज़ल पूनम जी ,
    ये खोने पाने का लेने देने का चक्कर न जाने कब तक चलेगा !

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  4. आदमी आदमी को क्या देगा, जो भी देगा खुदा देगा......तर्ज़ पर शेर अच्छे है

    परवरदिगार , बख्श - सही लफ्ज़ हैं |

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  5. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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  6. बहुत ही ख़ूबसूरती से आपने एक एक शेर लिखा है.
    हर शेर से दर्द ,नाउम्मीदी झलक रही है.
    बहुत खूब.
    बहुत ही खूब.

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  7. बहुत सार्थक प्रस्तुति, आभार|

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  8. दर्द है या दर्द का समंदर है.

    हर शेर दर्द की कहानी कह रहा है.

    बहुत खूबसूरत ग़ज़ल है.

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  9. या खुदा बक्स दे मुझको मेरे इस रफीकों से ......
    वाह पूनम जी
    गज़ब का आत्मविश्वास प्रसंसनीय !

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