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गुरुवार, 19 मई 2011

इंसान....






दुनिया में एक इंसान ही  
ऐसा प्राणी है जो  
बुद्धि से तोलता है हर रिश्ते को  
और जो तुलना करता रहता है हरदम...
कभी दूसरों की खुद से,
कभी खुद की दूसरों से भी.
हाँ !
लेकिन अपनी तुलना में  
उसके उदार भाव देखने को मिलते हैं !
वह कभी कृष्ण के चरित्र से
खुद को मिलाता है और  
जिन्दगी के सारे  
साम,दाम,दंड और भेद  
अपनों पर ही अजमाता है,
कभी जीसस के चरित्र के साथ
खुद को सूली पर चढ़ा पाता है,
तो कभी हरिश्चंद्र की तरह  
खुद को सत्यवादी कह कर  
दूसरों पर तरह-तरह के  
आक्षेप भी लगता है !
एक तरह से देखा जाये तो
जुर्म भी खुद तय करता है  
और सजा भी खुद सुनाता है !
लेकिन शायद यह भूल जाता है कि....
इस जिन्दगी से परे भी
एक अदालत है जहाँ.....
न किसी की पैरवी चलती है
न किसी की सुनवाई ही होती है ! 
जहाँ केवल सच देखा जाता है
शब्दों और व्याख्याओं से परे
बस, केवल नंगा सच !!
लेकिन वह दूसरों को
सच्चाई तो दिखता है..
पर खुद की सच्चाई से  
दूर भागता जाता है !
वह नहीं जानता कि  
आँख मूँद कर  
अँधेरे में चोरी-चोरी  
तीर चलाने से कुछ नहीं होता..!
कभी न कभी तो
सच सामने आता ही है !
और यदि न आ पाए तो भी
कोई तो है जो
सारी सच्चाई को आंकता है !!
सूरज की रोशनी में  
जब सच्चाई का सामना होता है
तभी कोई कृष्ण,कोई बुद्ध,कोई जीसस

और कोई हरिश्चंद्र बन पाता है..!!


17 टिप्‍पणियां:

  1. 'इंसान' को बहुत अच्छे शब्द दिए हैं आपने.

    सादर

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  2. सच की डगर पर चलने वाला ही आदर्श स्थापित कर पाता है।

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  3. नमस्कार !
    .....अक्सर जीवन में ऐसा होता है .
    वर्तमान जीवन के सन्दर्भ में सार्थक रचना
    आभार ..............

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  4. बहुत सकारात्मक और सार्थक सोच..सुन्दर और प्रेरक प्रस्तुति..

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  5. Bahut badhiya Poonam ji..Insaan ban jaayen ham to shayad bhagwan ki jarurat hi na rahe..sarthak abhivyakti.

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  6. सच्चाई के साथ ही जीसस कृष्ण .... निःसंदेह . सत्य का स्वरुप विराट होता है

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  7. प्रासंगिक विचार लिए रचना ....... हर पंक्ति सटीक है

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  8. Is duniya ke bahar bhi ek adalat hai. Sahi kaha apne.
    Jai hind jai bharat

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  9. सच-झूठ सही-गलत अपना-पराया स्वार्थ-परमार्थ बलि-बलिदान काला-सफ़ेद दान-प्रतिदान चरित्र-दुश्चरित्र ये सारे शब्द और भाव पूर्णतया सापेक्ष हैं अर्थात कोई भी घटना या कॄत्य या विचार अपने मॆं पूर्ण नही हैं ।

    परम सत्य तो अभी भी अप्राप्य ही है ।

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  10. डगर तो कठिन है पर चल कर वहां पहुंचा जा सकता है ..जैसे महान लोग पहुंचे हैं . सुन्दर रचना

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  11. आपकी कविता बहुत कुछ सिखा गयी
    सुन्दर रचना !!

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  12. कृपया मेरे ब्लॉग पर आयें http://madanaryancom.blogspot.com/

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  13. सच कहा है ... इंसान के साथ दिमाग़ जो लटका रहता है ... वो अपने आप को सबसे ऊँचा समझता है ...

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  14. सच को बहुत खूबसूरत शब्द दिए हैं आपने.
    खूबसूरत कृति के लिए आभार.

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