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शुक्रवार, 27 मई 2011

तुम......




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न जाने कितने

उतार-चढ़ाव
देखे हमने
इस जीवन में
साथ-साथ,
न जाने
कितनी पूजाएँ,
प्रार्थनाएं
सब कर डालीं
सीता,सावित्री की तरह मैंने,
वह सब करती गयी
जो तुम कहते गए,
लेकिन तुमने...
जो चाहा,
जब चाहा
सब किया !!
और वह सब
करते हुए तुम्हें....
मेरा,मेरी भावनाओं का
ज़रा सा भी
ख्याल न आया !!

कृष्ण,जीजस,हरिश्चंद्र....
और न जाने
कितने ही ऐसे
महापुरुषों का नाम
तुम गिनाते तो रहे
लेकिन.....
सत्यवान और राम
तुम न बन सके !!



7 टिप्‍पणियां:

  1. ऐसा ही होता है …………सब दूसरों पर लागू किया जाता है खुद पर नही।

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  2. कथनी और करनी का फर्क सदा रहा है मनुष्य में......इसमें पुरुष और स्त्री में भेद नहीं किया जा सकता है.....

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  3. बहुत कुछ सोचने को विवश करती हुई आपकी रचना ... ।

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  4. बहुत सटीक और सार्थक प्रस्तुति..कथनी और करनी में फर्क एक शास्वत सत्य है..

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  5. जब आदर्श दूसरों के जीवन में दिखते हैं तो अन्याय होता है।

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  6. पूनम जी....हम लोगों ने आप लोगों को बहुत देर से समझा है......इस देरी के लिए मैं हाथ जोड़कर आपसे माफ़ी मांगता हूँ....
    मगर ...अब शायद हमें अहसाश हो गया है,,,और अभी बहुत देर भी नही हुई है.

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