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शनिवार, 12 मार्च 2011

बस यूँ ही..........





कुछ इस तरह से
निभाई है दोस्ती हमने !
रहे न हम किसी के
खुद से भी
करली दुश्मनी हमने !!
दुहाई देते रहे
ज़िंदगी  भर मुहब्बत की हम जिसको !
न की खुद 
अपनी ही मुहब्बत से
दोस्ती हमने !!

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ज़िंदगी भर तूने की अपनी ही मनमानी सनम !
दोष देता है तू क्यूँ हर वक़्त दूजे को सनम  !!

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बन पतंगा तू जला
शम्मा किसी के बज़्म की थी !
दोष देता तू रहा
शम्मा को अपने बज़्म की ही !!

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एक पतंगे की किस्मत में रोज़ कहाँ है जल जाना !
लेकिन शमा जली है हर एक रात नया एक परवाना !! 



12 टिप्‍पणियां:

  1. बड़ी सुंदर पंक्तियाँ लिखी हैं आपने ... दूसरी रचना बहुत अच्छी लगी....

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  2. बहुत खूब ...यूँ ही भी बहुत कुछ कह गयी ..

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  3. सुन्दर रचनाएँ...दूसरी वाली रचना बहुत पसंद आई....
    इन्सान की फितरत दर्शाती है..

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  4. आप सभी का धन्यवाद....

    मेरा मार्गदर्शन करने के लिए...!!

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  5. कौन कहता है कि शंमा ने परवाने को बुलाया , मरने कि चाहत में वह खुद चला आया , अच्छी लगी बधाई

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  6. शमा - परवाने पर खूब लिखा है आपने वाह वाह.

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  7. thanx for decorating my blog with your comments,moreover आप ने भी बहुत अच्छा लिखा है ,बधाई

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