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बुधवार, 9 मार्च 2011

तू...........






मिट गई तेरे ह्रदय में,
डूब कर सब पा लिया हैं !
हाथ फैला तेरे आगे,
थाम कर अपना लिया है !!
ना कभी सोचा था मैंने,
तू है इतना पास मेरे !
जब,जहाँ चाहूँ,तुझे पाऊँ,
नयन बस मूँद मेरे !!
तू हमारा जब सहारा,
फिर किनारा दूर है कब !!
हाथ बढ़ा स्पर्श कर लूं,
जब,जहाँ चाहूँ,वहां तब !!


15 टिप्‍पणियां:

  1. बेहद खूबसूरत नज्म और आपके जज्बात भी --तारीफ के काबिल ---

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  2. बहुत सुंदर कविता....

    पहली बार आपके ब्लॉग पर आ कर बहुत अच्छा लगा...

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  3. फौलो भी कर लिया है.... थैंक्स फोर शेयरिंग..........

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  4. सुंदर प्रयास....अच्छा लिखा है....
    आप भी आइए....

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  5. वाह ! वाह ! परमानन्द से गदगद हो गया मन .बेहतरीन अनुभूति ."तू हमारा जब सहारा ,फिर किनारा दूर है कब"

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  6. आदरणीय पूनम जी , सादर प्रणाम

    सुन्दर कविता.....
    पहली बार आपके ब्लॉग पर आकर अच्छा लगा. पूनम जी "भारतीय ब्लॉग लेखक मंच" की परिकल्पना हमने एक भारतीय ब्लॉग परिवार के रूप में की है. हम चाहते है की इस परिवार से प्रत्येक वह भारतीय जुड़े जिसे अपने देश के प्रति प्रेम, समाज को एक नजरिये से देखने की चाहत, हिन्दू-मुस्लिम न होकर पहले वह भारतीय हो, जिसे खुद को हिन्दुस्तानी कहने पर गर्व हो, जो इंसानियत धर्म को मानता हो. और जो अन्याय, जुल्म की खिलाफत करना जानता हो, जो विवादित बातों से परे हो, जो दूसरी की भावनाओ का सम्मान करना जानता हो.

    और इस परिवार में दोस्त, भाई,बहन, माँ, बेटी जैसे मर्यादित रिश्तो का मान रख सके.

    धार्मिक विवादों से परे एक ऐसा परिवार जिसमे आत्मिक लगाव हो..........

    मैं इस बृहद परिवार का एक छोटा सा सदस्य आपको निमंत्रण देने आया हूँ. आपसे अनुरोध है कि इस परिवार को अपना आशीर्वाद व सहयोग देने के लिए follower व लेखक बन कर हमारा मान बढ़ाएं...साथ ही मार्गदर्शन करें.


    आपकी प्रतीक्षा में...........

    हरीश सिंह


    संस्थापक/संयोजक -- "भारतीय ब्लॉग लेखक मंच" www.upkhabar.in/

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  7. प्रिय पुनम जी
    सादर सस्नेहाभिवादन !

    मिट गई तेरे ह्रदय में,
    डूब कर सब पा लिया है!
    हाथ फैला' तेरे आगे,
    थाम कर अपना लिया है !!

    बहुत सुंदर रचना है …

    ना कभी सोचा था मैंने,
    तू है इतना पास मेरे !
    जब,जहां चाहूं,तुझे पाऊं,
    नयन बस मूंद मेरे !!

    लौकिक प्रेम कैसे सहज ही ईश्वरीय प्रेम का रूप लेता अनुभव हो रहा है … !
    अति मनोरम !

    मेरी एक राजस्थानी रचना के दो तीन बंद में ऐसे ही भाव पहचानने का प्रयास कीजिए …
    झुर-झुर' रो-रो'नैण गमावूं
    कींकर थां'नैं म्हैं बिसरावूं
    ………
    देव बसै घट मांहीं म्हारो
    मन-मिंदरियै धोक लगावूं

    बंध करूं म्हैं आंखड़ल्यां;अर
    राजिंद पिव रा दरशण पावूं



    आशा है, आप तक अर्थ संप्रेषित हो पाएगा
    वैसे इस रचना का हिंदी काव्यानुवाद भी प्रकाशित है , अभी मेरे कंप्यूटर में नहीं लेकिन …

    तीन दिन पूर्व ही था , इसलिए …
    विश्व महिला दिवस की हार्दिक बधाई !
    शुभकामनाएं !!
    मंगलकामनाएं !!!

    ♥मां पत्नी बेटी बहन;देवियां हैं,चरणों पर शीश धरो!♥



    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  8. Deedear e yaar ke liye khud me hi jhanka kiye,
    apne dil ke aaine me unhe phool sa taanka kiye.

    Shayad meri oopar ki do panktiyan ye batane ko kafi hain ki aapki khoobsurat abhivyakti mujhe chhoo gayi.

    Abhaar aapka.

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  9. positive aproach main har samay kisi k door hote huye bhi har dam sath rehna ka ehsaas dilati huyi kavita acchi lagi

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  10. मोनिकाजी,दर्शनजी,वीनाजी राकेशजी,अशुतोएवं दोनों विजयजी....
    मेरी कविता पर प्रकाश डालने के लिए आप सभी का धन्यवाद...!!

    हरीशजी....
    आपके सुन्दर प्रयास के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद !!
    आपका मेरे ब्लॉग पर आने के लिए शुक्रिया.....

    राजेन्द्रजी....
    आप सभी का सहयोग ही हम जैसों को लिखने के लिए प्रेरित करता है!!
    आपकी रचना के हिंदी अनुवाद की आवश्यकता नहीं है......
    कविता के भाव राजस्थानी भाषा होने के बावजूद भी स्पष्ट समझ में आ रहे हैं !!
    आपकी महिला दिवस पर लिखी रचना के लिए शुक्रिया...!!

    महफूज़ साहेब....
    बहुत-बहुत शुक्रिया मेरे ब्लॉग पर आने के लिए....
    साथ ही मुझे भी यह सुनहरा मौका मिला कि मैं आपकी रचनाओं को पढ़ सकूं,
    एक बार फिर शुक्रिया कि आपने मुझे यह मौका दिया....
    आपके सहयोग के लिए शुक्रगुज़ार हूँ....

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  11. एहसास की यह अभिव्यक्ति बहुत खूब....अच्छा लिखा है....

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  12. कई दिनों व्यस्त होने के कारण  ब्लॉग पर नहीं आ सका

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  13. संजयजी
    आपका पुन: आना अच्छा रहा...आपकी कमी हम सबने महसूस की....हमारी रचनाओं पर आपकी अभिव्यक्ति का हम सभी को इंतज़ार रहता है....!!

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