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रविवार, 12 जून 2011

अश्क....





हमने सोचा भी न था ऐसा भी दिन आएगा !
आँखों में बसता है जो दिल से दूर जायेगा !!

हमने बांधा नहीं आँखों में बसाया था उसे !
क्या खबर थी कि वह अश्कों में ही ढल जाएगा !!

औरों की शम्मा पे जलते हुए देखा है तुझे !
अपने घर का अन्धेरा कैसे तू मिटाएगा !!

तू मेरे दिल में है हर वक़्त साथ है मेरे !
तेरे वजूद में तू खुद न समा पायेगा !!

तूने खुद अपनी कही अपनी करी अपनी सुनी !
तेरा किया और कहा तेरे साथ जायेगा !! 



12 टिप्‍पणियां:

  1. हमने बांधा नहीं आँखों में बसाया था उसे !
    क्या खबर थी कि वह अश्कों में ही ढल जाएगा !!

    खूबसूरती से कही अपनी बात ..

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  2. सम्बन्धों के जटिल तार हैं,
    पीड़ा के समुचित उभार हैं।

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  3. aankhon mein bandh lijiye aur jee jaiye unhe,
    taumra unko is tarah se hi paa jaaiye unhe.

    bahut achha Punam ji...ek ek pankti samwad sthapit karti hai seedhe man se.

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  4. बहुत खूब शानदार ग़ज़ल है पूनम जी......आखिरी वाला शेर तो कमाल का है.....ब्लॉग का नया स्वरुप मुझे कुछ खास नहीं लगा.....हो सके तो बदल लें|

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  5. कुछ व्यक्तिगत कारणों से पिछले 15 दिनों से ब्लॉग से दूर था
    इसी कारण ब्लॉग पर नहीं आ सका !

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  6. वाह ... बहुत खूब कहा है आपने ।

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