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रविवार, 31 अक्तूबर 2010

अच्छाई और बुराई...
हर इंसान में
बराबर से बाँटता है ईश्वर.
कभी....
किसी में थोडा ज्यादा..
 किसी में थोडा कम,
कभी सोचा है आपने-
कि
आपसे अच्छे से पेश आने वाला
किसी और के लिए
दुखदाई भी हो सकता है
और आप खुद भी तो
किसी के लिए अच्छे
और किसी के लिए बुरे होते हैं
तो...
 किसने  ये हक दिया हमें
कि-
 हम नापें,तोलें,तुलना करें
 किसी की किसी से
और फिर लग जाये
उस को बदलने में
कभी भीतर  से-
 कभी बाहर से,
 खुद को नज़रंदाज़ करके
किसी और के
व्यव्हार का नापा-जोखा करें
और फिर...
सीधे-सीधे ये फरमान जारी करे
कि फलां कितना अच्छा है
और फलां कितना बुरा...
 जबकि सामने वाले की तरह ही
अच्छाई  और बुराई
हमारे  भीतर  भी है
कभी सोचा है कि
 सामनेवाला भी
हमें हमारी ही नज़र से
 देखता होगा.......................................

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छी रचना..
    आप मेरे ब्लॉग पार आयी बहुत अच्छा लगा ...लिखते रहिये
    शुरुवात हमेशा छोटे छोटे कदमों से ही होती है.. अपने मन में उठने वाली ख़ुशी-गम की हलचलों को यूँ ही लिखते रहना ..बस यूँ ही कब सच्ची रचना बन गयी पता नहीं लगेगा ....
    दीपपर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ .

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  2. वाह!!!वाह!!! क्या कहने, बेहद उम्दा

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  3. कभी फुर्सत मिले तो 'आदत.. मुस्कुराने की' पर भी पधारें !!

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