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रविवार, 31 अक्तूबर 2010

ज़िन्दगी की बिसात पर..
मोहरे हैं हम,
कभी  सिमटे  हुए
तो...
कभी बिखरे हुए.

2 टिप्‍पणियां:

  1. पुनमजी आप दो शब्द लिखती है पर उनमे बहुत गहराइ होती है.

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  2. आदरणीय पुनम जी
    नमस्कार !
    बहुत खूब .जाने क्या क्या कह डाला इन चंद पंक्तियों में
    कमाल की लेखनी है आपकी लेखनी को नमन बधाई

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