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सोमवार, 1 जुलाई 2013

'दुआ'....................





दुआयें दे रही कब से तुझे मेरी सदाएं हैं...
हमारे बाद भी रह जायेंगी मेरी वफाएं हैं...!

मुझे उम्मीद कब थी तुझसे मेरे हमसफ़र बतला...
मेरे दामन में आ सिमटी फ़कत तेरी जफ़ाएं हैं...!

तू मेरा था...तू मेरा है...रहेगा कल भी तू मेरा...
नज़र बदले कभी तेरी...यही मेरी दुआएं हैं....!



***पूनम***
एक कोशिश...अभी अभी....




9 टिप्‍पणियां:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन मिलिये ओम बना और उनकी बुलेट से - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. पढ़ कर मुंह से वाह वाह ही निकलता हैं
    सच में बेहद सार्थक रचना है।
    बहुत अच्छी लगी

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  3. बहुत खूब......आखिरी शेर में नज़र 'न' बदले होना था शायद।

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    1. भाई...
      मेरे हिसाब से तो ठीक ही है...!
      दोनों शेरों के साथ इसका भाव ठीक बैठता है...!!

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