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शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2011

ज़िंदगी न मिलेगी दोबारा.....



ज़िंदगी न मिलेगी दोबारा.....

खुदा की नेमतें हैं ये, इबादत की तरह लो तुम..
न रोको तुम इसे, ये जिन्दगी भरपूर जी लो तुम !

गयी गर जिन्दगी तो ये,  पलट कर फिर न आयेगी..
अभी जी लो,यहीं जी लो, इसे बाँहों में ले लो तुम !

तुम्हारी जिन्दगी मोहताज कब से हो गयी जानां..?
तुम्हारी थी तुम्हारी है, ये कब तुमने था पहचाना..??

न होना अब कभी नासाज़ अपनी रूह से जानां..!!
ज़रुरत जब लगे मेरी, हमारे पास आ जाना...!!

जलाएंगे शमा उम्मीद की मिल कर के हम दोनों..
जो  थे दुश्मन,रहें दुश्मन ! फिकर क्यूँ कर करें दोनों !!

हमारी जिन्दगी पर शौक से तोहमत लगा लें  वो !
खुदा बक्शे उन्हें किस्मत ! गिरेबाँ अपने झांकें वो !!




रविवार, 16 अक्टूबर 2011

कुछ एहसास हमारे....

इमरान साहेब और विशाल जी....
मेरे ब्लॉग पर नियमित आने का शुक्रिया !!
कुछ एक से हालत..ज़ज्बात....
आपको शुक्रिया कहने के लिए जो लिखना शुरू किया
तो कुछ इस तरह लिखा गया मुझसे...
ये मैंने नहीं लिखा बल्कि आपने लिखवाया है  
इसलिए ये रचना आप दोनों को समर्पित है.... 




कुछ एहसास हमारे....


पत्थरों के शहर में
उबड़-खाबड़ चट्टानों के बीच भी
कुछ एहसास बचा के रखे हैं हम सबने...!
कुछ अपने से,कुछ बेगाने से
कुछ अनमने से, कुछ पहचाने से,
सबसे छुपा के, कहीं भीतर सजा के,
दुश्मनों की नज़र से बचा के,
बददुआवों  पर पर्दा गिरा के.....
पंडितों और ज्ञानियों के ज्ञान से भी बचा के !!
कुछ सहमे, कुछ सकुचाए..
कुछ मासूम से, कुछ कुम्हलाए..
कुछ हरे-भरे, कुछ मुरझाये...
कुछ हँसते  हुए,कुछ शर्माए,
अपनी ही खुशबू से हमने जो महकाए..!
बाकी सब एहसासों पर
कब्ज़ा जमा कर बैठे हैं वो...(सब)
लेकिन इन पर केवल हमारा हक है...!!
ये एहसास हैं बस हमारे....
न तुम्हारे , न किसी और के !
बस, दूर ही रखो इनसे अपने आप को
वर्ना इन पर भी दिखावे के रंग चढ़ जायेगें,
ज्ञानी तो ये हो जायेंगे लेकिन
जिन्दगी जीना भूल जायेंगे...!
फिर अपनों में भी बैठ के
खोखली हँसी हँसना 
इन्हें आ जायेगा,
हर रिश्ते,हर  सम्बन्ध  के साथ  
जोड़-घटाना भी इन्हें आ जायेगा !
न जाने   कितने तानों  और उलाह्नाओं से
बचा के रखा है इन्हें हमने...!
ये केवल हमारी अमानत हैं
फिर क्यों इन पर नज़र गड़ा रखी है तुमने  !
अब छोड़ो भी ....
थोड़ा तुम भी आराम करो
और रहने दो चैन से हमें भी !
ये एहसास हैं केवल हमारे
तो तुम्हारे एहसास भी होंगे कुछ ऐसे ही.....!!



मंगलवार, 11 अक्टूबर 2011

उसने कहा था.....









उसने कहा था...
यह जिन्दगी एक रंगमंच है,
यहाँ हर इंसान,हर रिश्ता
हर अनुभूति और हर संवेदना
एक छलावा है,एक दिखावा है !
जीना है सुख से तो
बस,प्रैक्टिकल बन जाओ,
मेरे साथ रहती हो तो
सारे एहसासों को ताख पर रखो
अरे,कुछ तो मुझसे सीखो !
देखो,मैं कैसे हर सम्बन्ध
हर रिश्ते और एहसास से मुक्त हूँ !
मैं खुद नहीं फंसता हूँ,
बस अपना काम करता हूँ.
प्रैक्टिकल हूँ....
इसीलिए हर इमोशन से दूर रहता हूँ !!
तुम भी जिन्दगी के इस रंगमंच पर
जब नाटक करना सीख जाओगी
तो भावनाओं के इस कष्ट से
सहज ही मुक्ति पा जाओगी !
फिर जीना होगा कितना आसान
न कोई बंधन,न होगी तुम परेशान !!
और फिर उसी के साथ
मैंने भी उसी की तरह
जीना सीख लिया है !
एक तरह से....
कई एहसासों और ज़ज्बातों से
धीरे-धीरे किनारा कर लिया !! 
फिर भी.....
कहीं भीतर
कुछ ज़ज्बात,कुछ एहसास
अभी भी जिंदा हैं...
जो नितांत मेरी धरोहर हैं......!!


शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2011

अजीब संयोग.......




अजीब संयोग है....
हजारों साल बीत गए
राम और कृष्ण को हुए,
सीता और राधा को हुए...!
लेकिन हम जब भी
उदाहरण देते हैं आज भी
किसी नारी को 
पतिव्रता की तो
सीता से.....!
लेकिन प्रेम के लिए
राधा का उदाहरण देकर
मान्यता न दे पाए...!!
क्यों.....???
गर देखा जाए तो
सीता में प्रेम लुप्त है
और राधा में पतिव्रता...!
और पुरुष विवाह  होते ही
राधा सा प्रेम तो  
भूल जाता है लेकिन
पत्नी को सीता की
पतिव्रता ही समय-समय पर
याद दिलाता है....!!
लेकिन आज भी
हम पुरुषों को पत्निव्रता के लिए
राम का उदाहरण  न दे पाए !
आज भी अपने लिए
सीता सी पत्नी चाहने वाले
ज्यादातर पुरुष
अपने प्रेम  के लिए  
कृष्ण का ही
उदाहरण देते नज़र आते हैं ! 
क्योंकि वहां सुविधा है,
कोई बंधन  नहीं है...
न विवाह का, न रिश्ते का
न  परिवार का, न  समाज का !!
यहाँ एक  खुलापन है...
जो हर स्वभाव से,
हर परिवेश से,
हर परिस्थिति से
और हर व्यक्ति से
कहीं न कहीं 
मेल  खा ही जाता है !!
और हमारे समाज में
बेचारा राम...
अपना एक पत्नीव्रता का व्रत लिए
उदाहरण बनने से रह जाता है...!!  



शनिवार, 24 सितंबर 2011

शिक्षा.....








ज़िंदगी रोज़ ही
हमें कुछ न कुछ
सिखाती जाती है...
ज़रुरत है हमें
बाहरी आँखों के साथ
भीतर की आँखों को भी 
खुला रखने की !
बाहर के साथ-साथ 
भीतर भी कुछ घटता है 
और भीतर का घटना
खुली आँखों से
नहीं दिखाई देता है....!!
हम चाहते हैं कि
बदलाव दिखाई दे बाहर, 
कुछ वैसा ही
जैसा की भीतर हो रहा है
लेकिन....कोई है....
जो महसूस कर रहा है
यह बदलाव,
और चाह के भी
दिखा नहीं पा रहा है !
क्योंकि यह घटना 
घटती है कहीं अन्दर.....
जहाँ पहुँच पाना आसान नहीं
किसी के लिए भी,
और कभी-कभी
स्वयं के लिए भी.....!!


सोमवार, 19 सितंबर 2011

बुद्धि.......






ईश्वर की सबसे उत्कृष्ट कृति
है ये इंसान...!
और उसके पास एक चीज़ है
बुद्धि.....!
जिसे इस्तेमाल करने की
पूरी-पूरी स्वतंत्रता दी है
ईश्वर ने इंसान को !!
इंसान सब काम करता है
इसी बुद्धि से !
जब कोई काम अच्छा हो जाता है
तो उसका श्रेय अपने सिर पर लेता है
और जब कोई काम
बिगड़ जाता है उससे तो.....
उसका दोष
वह ईश्वर के सिर पर मढ़ देता है !
इंसान सब छोड़ सकता है परन्तु
एक बुद्धि ही है....
जो वह किसी तरह भी
छोड़ने के लिए तैयार नहीं होता !
जहाँ उसे बुद्धि लगानी होती है
वहां नहीं लगता.....
और जहाँ नहीं लगानी होती है
वहां बेवजह लगाता रहता है !!

शनिवार, 3 सितंबर 2011

अधूरी तस्वीर......




कोने में पड़ी वो तस्वीर
जो तुमने बनायी थी कभी..
कितनी अकेली है !  
क्योंकि वह अधूरी है......!!
और
यही वास्तविकता है तुम्हारी !
तुम उसे पूरा नहीं कर सकते !!
क्योंकि-
तुम्हें तो ख्वाबों में
रंग भरने की आदत है,
तुम अपने ख्वाबों को
पूरा करने के लिए
एहसासों में जीते हो,
सारा समय उन्हें ही 
पूरा करने में
लगे रहे हो अब तक !
शब्दों को जीते हो हकीकत में,
और ख्वाबों में-
भावनाओं,एहसासों में खो जाते हो !
इसीलिए ख्वाबों की दुनिया
हकीकत नहीं हो पाई
अब तक तुम्हारी !
उस अधूरी तस्वीर की तरह
तुम्हारी हकीकत
आज भी अधूरी है !!
क्योंकि हर बार
तुम आगे बढ़ जाते हो
अपने ख्वाबों की दुनिया में
एहसासों को जीने के लिए,
उन्हें पूरा करने के लिए !
और हर बार तुम्हारा
ध्यान हट जाता है
अपनी ही हकीकत से
अपनी उस अधूरी तस्वीर की  तरह
जिसे तुम अभी तक
पूरा नहीं कर पाए हो !
और  इसीलिए
तुम छटपटाते भी हो कि
तुम्हारी हकीकत
तुम्हारे ख्वाबों की
पूर्णता क्यों नहीं बन पाती ??
प्रश्न खुद से करो तो सही होगा....!!!