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रविवार, 21 अगस्त 2011

मोहरे ........




कुछ लोग जिंदगी को शतरंज की तरह खेलते हैं
जीवन की हर परिस्थिति और घटना को,
यहाँ तक की अपनी भावनाओं और एहसासों को
और कभी भाग्य और भगवान् को भी  
गोटियों की जगह मनचाहे रूप से रखते हैं.
कभी-कभी.....
अपने रिश्तों और संबंधों को भी
कभी प्यादे तो कभी सैनिक         
और कभी घोड़े और वजीर बना डालते हैं,
लेकिन चालें राजा की तरह खुद  चलते हैं !!
सारा खेल उनका ...
सारी चालें उनकी सोची-समझी,
फिर अचानक क्या हो गया....??
गर सोची-समझी चालें  
उनके हिसाब से सही   बैठ पाईं तो....
तो दूसरा दोषी कौन और क्यों ??
सारे प्यादे,घोड़े,सैनिक   
सब के सब तो उसी के थे ....
उसी ने अपनी मनचाही जगह पर
फिट भी किये थे,
और तो और ...
पासा भी तो उसने अपने हिसाब से फेंका था,
बाकी दूसरा खिलाड़ी तो मूक दर्शक ही था .
दोनों  ही चालें खुद उसकी थीं ...
सोची ,समझी,“तयशुदा चालें”....
फिर सारा दोष दूसरों पर क्यूँ डालें ?
एक साथ सारी  ही चालें गलत हो ,
वह भी उसी के खेल में
तो खुद को देखे  
और खुद  आंकलन करे !!
खेल में गोटियाँ स्वयं नहीं चलती
चलाई  जाती  हैं.
लेकिन जब इंसान हो गोटियों की जगह तो
कभी  कभी तो जीवंत हो उठेगा
तो दोष बादशाहत का है
जिसने इंसानी रिश्तों को
शामिल किया अपने खेल में  
या उन प्यादों और सैनिकों का है?
सब के सब एक साथ 
गलत जगह पर खुद से नहीं जा बैठते हैं
 ही ये उनकी सोची-समझी चाल है!
ये तो खेलने वाला जाने  
जो अपनी बादशाहियत को बचाने के लिए
कुछ भी करने को तैयार है
या  फिर  भाग्य  का  खेल   मान  कर
हर  किसी   से  किनारा  करने  को  तैयार  है !!



शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

सच....



'सत्यं ब्रूयात प्रियं ब्रूयात
न ब्रूयात सत्यं अप्रियम '
क्योंकि मैंने भी
यही जाना है
कि सत्य बोल कर
जितनी चोट पंहुचाई जा सकती है
उतनी झूठ बोल कर नहीं
और शायद मैं इसी लिए चुप रहती हूँ....!!!


मंगलवार, 9 अगस्त 2011

भ्रम......




बदहवासी हर तरफ छाई है ऐसी
खोजते हैं लोग अब तन्हाइयां !
मुंह छुपा कर रो सकें चुपचाप वो 
और न देखे उन्हें अब ये जहाँ....!!

ओढ़ कर झूठा लबादा चैन का वो
बाँट कर लोगों को अपनी झूठी खुशी वो !
बन मसीहा हो गए मशहूर हैं सब..
दाग दामन में लिए फिरते हैं कितने वो !!

कर जहाँ की और इन्सां की बुराई  
रिश्तों और किस्मत की करके भी बुराई !
न मिला है चैन उनकी रूह को फिर भी
दे रहे हैं अब खुदा की ही दुहाई !!