दिल में दर्द छुपाना कैसा...?
जख्मों को दिखलाना कैसा...?
आँसू जब आँखों में आएँ...
नीचे नज़र झुकाना कैसा...?
इश्क़ किया है, दिल है हारा...
फिर पीछे पछताना कैसा..?
शम्मा ने पूछा चुपके से...
"परवाने जल जाना कैसा...?"
मंजिल तो मिल ही जायेगी...
राही यूँ घबराना कैसा...?
रस्ता कहाँ, कहाँ है जाना...
बिन पूछे बतलाना कैसा...?
रात अँधेरी नींद नदारत...
'पूनम' ख्वाब सजाना कैसा...?
***पूनम***
जादू की है ये दुनिया दस्तूर हैं बदलते...
तुम हमसे नहीं मिलते हम तुमसे नहीं मिलते...!
ये इश्क़ मुहब्बत की बातें भी अजब होतीं...
चाँदी से भरी रातें साँसों में फूल खिलते...!
आहिस्ता करो बातें सुन ले न जमाना ये....
ख्वाबों में चले आना शब चाँद के निकलते...!
दुनिया बड़ी जालिम है मुँह मोड़ के हँसती है...
जब शम्मा दिखी रौशन परवाने दिखे जलते...!
आना तो कभी 'पूनम' इन महकी फिजाओं में...
यूँ तो हैं किताबों में लाखों गुलाब खिलते...!
***पूनम***
26 मार्च, 2016
हमारे ख्वाब में आना किसी का ख़ास रहता है..!
जो रहता दूर हम से शख्स वो ही पास रहता है..!
कहीं हम छोड़ आये थे हसीं पल जिंदगी के यूँ...
बिछड़ के भी न जाने क्यूँ सदा मधुमास रहता है...!
किसी की याद में खोना..किसी को हिज़्र में पाना...
कहूँ क्या..हर समय उसका ही बस आभास रहता है...!
बहुत दुनिया की रस्में हम निभाते आये हैं अब तक...
कभी तो मन की कर लें ये भी तो एहसास रहता है...!
किसी का लौट जाना भी भरम देता है 'पूनम' को...
कहीं भी जा रहे वो ज़िन्दगी की आस रहता है...!
***पूनम***
मुश्किलें ही मुश्किलें हैं...ग़म नहीं...
ज़िन्दगी में फिर भी खुशियाँ कम नहीं...!
तीरगी यूँ तो बहुत है राह में...
साथ मायूसी का पर आलम नहीं...!
दर्द मेरे दिल को रौशन कर गया...
याद तेरी साथ, तू हमदम नहीं...!
नाम को हैं साथ सब रिश्ते यहाँ...
दे रहे हैं साथ पर दमख़म नहीं...!
महफिलें गर हैं तो क्यूँ वीरानगी...
साथ तो सब हैं मगर 'पूनम' नहीं...!
***पूनम***
खोजती हूँ कहीं तो ठिकाना मिले...
आप मिल जायें तो इक सहारा मिले..!
कब से मायूस हूँ, चाहती हूँ ख़ुशी...
मेरी नज़रों को ऐसा नज़ारा मिले...!
हाल खस्ता मेरे तो जमाने से हैं...
या खुदा अब कोई तो खज़ाना मिले...!
चाहता दिल मेरा गीत गाना मगर...
ढंग का कोई तो इक तराना मिले...!
बेसबब बेवजह है किसे ढूँढता....
इस जहां में कोई तो हमारा मिले...!
चाँद पहलू में 'पूनम' के खामोश है...
जो खिले रात को वो शरारा मिले...!
***पूनम***
जब से नज़रों में तू समाया है..
हर तरफ इक नशा सा छाया है...!
देख कर होश गुम हुए मेरे..
तूने नज़रों में क्या मिलाया है ..!
बेख़ुदी और बढ़ गई मेरी..
दूर रह कर हमें सताया है...!
हिज़्र की बात भूल बैठे हैं..
वस्ल ने हौसला बढ़ाया है...!
मुन्तज़िर तो तेरा ज़माना था..
तूने अपना हमें बनाया है...!
हौसला तू भी देख 'पूनम' का..
नाम लब पर न तेरा आया है...!
***पूनम***
इक खराबा बसा गया कोई...
प्यार फिर से जता गया कोई..!
ख्वाब रूठे थे मुझसे बरसों से..
आज सपने जगा गया कोई..!
बिन पिए इक नशा सा रहता है..
होश ऐसे उड़ा गया कोई..!
नींद में उठ के बैठ जाती हूँ..
यूँ लगे है कि आ गया कोई..!
रात की बात क्या करें 'पूनम'..
बुझ चुकी लौ जला गया कोई..!
***पूनम***