रविवार, 20 फ़रवरी 2011
शनिवार, 19 फ़रवरी 2011
मौन...........तब और अब...
मौन...........
तब--अप्रैल,१९८४
मौन भी अभिव्यक्ति है !
यदि तुम समझ सको तो !!
मैं क्या कहूं ?
कैसे कहूं ?
कब कहूं तुमसे ?
जानती नहीं !
शायद....
कभी न कह सकूं
अपने मन की बातें !
तुम्हें स्वयं समझाना होगा -
मुझे और
मेरे मौन को भी .
पढ़नी होगी मेरी आँखों की भाषा ,
शायद---
ये मेरे मौन को कुछ शब्द दे सकें .
समझनी होगी तुम्हें
मेरे होठों की थरथराहट ,
शायद ये मेरे शब्दों को स्वर दे सकें .
मेरे मौन को
यदि तुम नहीं समझ सके
तो कौन समझेगा ?
शायद मैं -
मन की बात कभी न कह सकूंगी !
यही आशा है तुमसे
कि तुम मेरे अस्तित्व को
अपने में समेट लो !
इसीलिए आई हूँ तुम तक
कि तुम....
मेरी मूक अभिव्यक्ति को समझ सको !!
मौन..........
अब---2008
मौन भी अभिव्यक्ति है !!
अब ये समझे हो तुम !!
शायद उस समय.....
मैं अपरिपक्व थी या फिर तुम....
पता नहीं....??
चलो,मेरा ये इंतज़ार भी
ख़त्म अब हुआ.....!!
इतना लम्बा अरसा बीत गया
पर मौन की भाषा
अब समझे तुम..!!
किसी की आँखों की,
किसी के कांपते होंठों की ,
और किसी के स्पर्श की सरसराहट
ये अभिव्यक्ति तुम्हें दे पाई.....
गनीमत है,
इस ज़िन्दगी में.....
तुम्हारी ये अपूर्णता तो
पूर्ण हो पाई...!!!
शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011
कहीं तो कुछ मिले.............
ज़िन्दगी एक खेल है-
अपूर्णता को पूर्ण करने का !!
और सभी खेलते हैं ....
जाने अनजाने !!
ज़िन्दगी के शुरूआती दौर में
कुछ लोग समझ ही नहीं पाते
इस खेल को,
और कुछ समझदार
खेलते है इसे समझ- बूझ कर !!
हर रिश्ता,हर सम्बन्ध
एक जाना-बूझा....
समझ कर बनाया गया.....
कहीं से कुछ पाने की इक्छा
कहीं कुछ देने की चाह....
सब कुछ लेन-देन पर......
भौतिक,शारीरिक,भावनात्मक और संवेदनात्मक......
भले ही वह किसी
अनुभूति को पूर्णता देने वाला हो,
पर जान-बूझ कर
सोच-समझ कर बनाया गया हर रिश्ता
ज़िन्दगी में कहाँ तक
पूर्णता दे पायेगा.....
पता नहीं..........???
बुधवार, 16 फ़रवरी 2011
इंतज़ार.............

साँझ ढले....
पर्वतों के पीछे से आ
नदी को पार कर
जब भी एक छाया
मंदिर की सीढियां
हौले-हौले
गीले क़दमों से
चढ़ती है,
तब....
न जाने क्यूँ
मन करता है
उससे मिलने को.
लेकिन--
जब तक मैं अपने घर से
मंदिर तक का रास्ता पार करता हूँ,
तब तक वह छाया
उसी रास्ते
वापस पर्वतों के पीछे
न जाने कहाँ
गुम हो जाती है,
और मैं-
मंदिर की सीढ़ियों पर
बैठा-बैठा
उसके चढ़ाए गए फूलों की
भीनी-भीनी खुशबू में
उसके बदन की खुशबू को
महसूस करता रहता हूँ !
मंदिर के घंटों की आवाज़ में
उसके बोलों को
सुनता रहता हूँ मैं,
देर तक..................................!!
मंगलवार, 15 फ़रवरी 2011
शनिवार, 12 फ़रवरी 2011
स्पर्श --
जब भी कभी-
सोचा है तुम्हारे बारे में,
मैंने अपनी तन्हाई में
तो यूँ लगा कि...
जैसे तुम पास हो मेरे
बहुत ही पास !!
इतने कि -
मैं तुम्हें.....
हाथ बढ़ा कर
छू सकती हूँ.
मैंने तुम्हारा स्पर्श
महसूस भी किया है
ऐसे पलों में,
जबकि मैंने तुम्हें
अपने पास पाया है
ऐसा हर एक लम्हा
जो तुम्हारे साथ गुज़रा है मेरा
संजो कर रखा है मैंने !!
क्योंकि,
इन लम्हों में तुम मेरे पास होते हो,
मेरे बहुत-बहुत पास !!!
मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011
मुक्त-------
अहंकार,ego!! कैसा लगता है सुनने में ?? अजीब सा न ??एक अजीब सा व्यक्तित्व सामने आ जाता है-stiff,तना हुआ सा,गर्दन ऊंची,अकड़ी हुई....और भी क्या क्या ?? आप कुछ भी सोच सकते हैं,किसी भी हद तक !! सच में,ये अहंकार,ego है क्या ??कह पाना बड़ा मुश्किल होता है.जब दूसरे में हो तो साफ़ नज़र आता है,और अगरअपने में हो तो......??बड़ी मज़ेदार है ये दुनिया!! ईश्वर ने जैसी भी बनाई है...बड़ी सुन्दर है.भिन्न-भिन्न
स्थान,वहां की प्रकृति,जलवायु,वातावरण,खानपान और किस्म किस्म के लोग,उनकी प्रकृति,प्रवृत्ति,स्वभाव और साथ ही साथ जीवन में रोज़-रोज़ घटने वाली घटनाएं और उनसे उत्पन्न परिस्थितियाँ.....!! अब ये आप पर है कि आप उनसे कैसे दो-चार होते हैं..!!बेहतर यही है कि आप खुद को उन्हीं के हिसाब से ढालते चले जाएँ,
जीवन में होने वाली रोज़-रोज़ की घटनाओं को साक्षी भाव से देखें और उन्हीं के अनुसार जीवन को नदी की तरह अपना गंतव्य बनाने दें. अगर आप बहने के लिए तैयार नहीं होंगे तो आपके स्वाभिमान को अहंकार का जामा पहना कर आपको समाज के सामने पेश करने के लिए भी लोग तैयार ही बैठे हैं....अब आप के ऊपर है कि आप स्वाभिमान बचाना चाहते हैं और अभिमानी कहलाना पसंद करेंगे,या जिंदगी के साथ बहने को तैयार हैं??
वैसे स्वाभिमान और अहंकार में ज़रा सा फर्क है-स्वाभिमान खुद के लिए और अभिमान या अहंकार दूसरों के दिखाने के लिए होता है!!ज़रा सा इधर से उधर हुए कि............!!! कई बार ज्यादा स्वाभिमान कब चुपके से अहंकार में बदल जाता है कि पता ही नहीं चलता.......!!
बहुत नम्र दिखने वाला व्यक्ति भी अहंकारी हो सकता है. नम्रता का, अच्छा होने का भी अपना ही अहंकार होता है और अच्छा होने का अहंकार(ego) बुरा(खराब) होने से कहीं ज्यादा होता है.
बुरे व्यक्ति को कभी न कभी जिंदगी में ये एहसास हो ही जाता है कि उसने कुछ गलत भी किया है और एक transformation की,एक परिवर्तन की संभावना रहती है और अच्छा आदमी तो............!!जिंदगी भर इसी सोच में रहता है कि वह तो अच्छा ही है,बाकी सारे गलत हैं फिर change किसको होना है,परिवर्तन किसमें होना है और उंगली दूसरे की तरफ उठ जाती है.हम रोज़ अपने
इर्द-गिर्द ऐसे ही लोगों का,ऐसी परिस्थितियों का और ऐसी ही घटनाओं का सामना करते रहते हैं और खुद भी तो ऐसा ही करते हैं. भले ही खुद को सही माने,या गलत.....लेकिन उंगली हमेशा सामने वाले पर ही उठाते हैं.अच्छा करते हैं तो सामने वाले को दिखाते हैं कि मैंने कितना अच्छा किया और गलत किया तो सामने वाले को बताते हैं
कि उसकी वज़ह से,उसके व्यवहार से हम गलत करने को प्रेरित या बाध्य हुए.....! बहरहाल अपने जीवन में होने वाली घटनाओं की,यहाँ तक कि अपने व्यवहार की पूरी-पूरी जिम्मेदारी
हम ही नहीं लेते...!उन्हें समय,व्यक्ति,परिस्थिति और घटनाक्रम के हिसाब से विभिन्न खांचों में डालते रहते हैं.किसी ने ठीक ही कहा है कि जीवन में हम अपने इर्द-गिर्द तरह-तरह की खूँटियाँ टाँगे हुए हैं....!व्यक्ति,परिस्थिति,और घटनाओं के रूप में और हम अपने कर्म और व्यवहार को अपने अनुसार इन खूंटियों पर टांग कर निश्चिन्त हो जाते है. अपने आप को मुक्त करने का इससे अच्छा और सरल उपाय नहीं है हमारे पास !!!
तो फिर तैयार हो जाइए और अपने आस-पास कुछ ऐसी ही खूँटियाँ लगा लीजिये और अपने कर्म और व्यवहार को उन अलग-अलग खूंटियों पर टांग कर मुक्त हो जाइए !!!
स्थान,वहां की प्रकृति,जलवायु,वातावरण,खानपान और किस्म किस्म के लोग,उनकी प्रकृति,प्रवृत्ति,स्वभाव और साथ ही साथ जीवन में रोज़-रोज़ घटने वाली घटनाएं और उनसे उत्पन्न परिस्थितियाँ.....!! अब ये आप पर है कि आप उनसे कैसे दो-चार होते हैं..!!बेहतर यही है कि आप खुद को उन्हीं के हिसाब से ढालते चले जाएँ,
जीवन में होने वाली रोज़-रोज़ की घटनाओं को साक्षी भाव से देखें और उन्हीं के अनुसार जीवन को नदी की तरह अपना गंतव्य बनाने दें. अगर आप बहने के लिए तैयार नहीं होंगे तो आपके स्वाभिमान को अहंकार का जामा पहना कर आपको समाज के सामने पेश करने के लिए भी लोग तैयार ही बैठे हैं....अब आप के ऊपर है कि आप स्वाभिमान बचाना चाहते हैं और अभिमानी कहलाना पसंद करेंगे,या जिंदगी के साथ बहने को तैयार हैं??
वैसे स्वाभिमान और अहंकार में ज़रा सा फर्क है-स्वाभिमान खुद के लिए और अभिमान या अहंकार दूसरों के दिखाने के लिए होता है!!ज़रा सा इधर से उधर हुए कि............!!! कई बार ज्यादा स्वाभिमान कब चुपके से अहंकार में बदल जाता है कि पता ही नहीं चलता.......!!
बहुत नम्र दिखने वाला व्यक्ति भी अहंकारी हो सकता है. नम्रता का, अच्छा होने का भी अपना ही अहंकार होता है और अच्छा होने का अहंकार(ego) बुरा(खराब) होने से कहीं ज्यादा होता है.
बुरे व्यक्ति को कभी न कभी जिंदगी में ये एहसास हो ही जाता है कि उसने कुछ गलत भी किया है और एक transformation की,एक परिवर्तन की संभावना रहती है और अच्छा आदमी तो............!!जिंदगी भर इसी सोच में रहता है कि वह तो अच्छा ही है,बाकी सारे गलत हैं फिर change किसको होना है,परिवर्तन किसमें होना है और उंगली दूसरे की तरफ उठ जाती है.हम रोज़ अपने
इर्द-गिर्द ऐसे ही लोगों का,ऐसी परिस्थितियों का और ऐसी ही घटनाओं का सामना करते रहते हैं और खुद भी तो ऐसा ही करते हैं. भले ही खुद को सही माने,या गलत.....लेकिन उंगली हमेशा सामने वाले पर ही उठाते हैं.अच्छा करते हैं तो सामने वाले को दिखाते हैं कि मैंने कितना अच्छा किया और गलत किया तो सामने वाले को बताते हैं
कि उसकी वज़ह से,उसके व्यवहार से हम गलत करने को प्रेरित या बाध्य हुए.....! बहरहाल अपने जीवन में होने वाली घटनाओं की,यहाँ तक कि अपने व्यवहार की पूरी-पूरी जिम्मेदारी
हम ही नहीं लेते...!उन्हें समय,व्यक्ति,परिस्थिति और घटनाक्रम के हिसाब से विभिन्न खांचों में डालते रहते हैं.किसी ने ठीक ही कहा है कि जीवन में हम अपने इर्द-गिर्द तरह-तरह की खूँटियाँ टाँगे हुए हैं....!व्यक्ति,परिस्थिति,और घटनाओं के रूप में और हम अपने कर्म और व्यवहार को अपने अनुसार इन खूंटियों पर टांग कर निश्चिन्त हो जाते है. अपने आप को मुक्त करने का इससे अच्छा और सरल उपाय नहीं है हमारे पास !!!
तो फिर तैयार हो जाइए और अपने आस-पास कुछ ऐसी ही खूँटियाँ लगा लीजिये और अपने कर्म और व्यवहार को उन अलग-अलग खूंटियों पर टांग कर मुक्त हो जाइए !!!
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