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शुक्रवार, 23 नवंबर 2012

मेरी नज़र में.......






वल्लाह न कहू तो तुझे और क्या कहूँ....
बन कर गज़ल तू मेरे जेहन में उतर गया...!

चाहा था लाख तुझको भुला दूँ...मगर नहीं
तस्वीर बन के मेरी नज़र में उतर गया....!

तेरा जमाल..तेरी मुहब्बत का शुक्रिया...
जब से मिला है मुझको..तू मुझमें ठहर गया..!

औरों का न ख्याल है...न अपना अब रहा...
बस तू ही नज़र आता है...जब भी जिधर गया...!

ए मेरे सनम..मेरे खुदा...तुझको क्या कहूँ..
तू रूह बन के मेरे जिसम में उतर गया.....!






मंगलवार, 20 नवंबर 2012

तितली या कठपुतली मत बनिये -महादेवी वर्मा


खंडवा ( मध्य प्रदेश ) के शासकीय कन्या महाविद्यालय में दिया गया प्रखर चिंतक--कवियत्री महादेवी वर्मा का यह व्याख्यान आप को साझा कर रही हूँ ! इसके लिए मैं आभारी हूँ श्री सुनील दत्ता जी  और  "लोक गंगा" पत्रिका की जहाँ से मैंने इसे प्राप्त किया .......



तितली या कठपुतली मत बनिये -महादेवी वर्मा

          मुझे पता नहीं था कि आप के बीच आना है दिन भर घूमती रही अन्त में यहाँ आई हूँ तो बहुत थकी हूँ | आप से बहुत बात करना चाहती थी लेकिन बंधुओ ने मौका नहीं दिया | अब आप से इतना कहना चाहती हूँ कि  भारत का भविष्य आपके हाथ में है , लड़को के हाथ में नही है हमारे यहाँ लड़की जन्म लेते ही पराई हो जाती है | सब कहते है , अरे , लड़की हो गई, जो सुनता है , आह कर के रह जाता है और जब वह बड़ी होती है तो सब कहते है , पराए घर का धन है , याने वह धन है , सम्पत्ति है , जीवित व्यक्ति नहीं है , सामान है , और अगर किसी ने दहेज कम दिया तो उसे जला देते है , सो हमारे यहा लड़की को बहुत सहना होता है |
                       लेकिन हमारी संस्कृति ने हमें बहुत शक्ति दी है | देखिये , ब्रह्मा के चार मुँह है , सो कोई नहीं जानता उनको क्यों बनाया क्योंकि चार मुँह से हो सकता है , चार तरह की बात करते रहे होंगे | बनाया तो सरस्वती को है | सरस्वती एक बात करती है | हमारे ज्ञान की अधिष्ठात्री है |हाथ में वीणा लिए हुए है , पुस्तक लिए हुए है , अक्षमाला लिए हुए है | समय , हर क्षण का प्रतीक है वो | और समय के लिए सृजन का प्रतीक है |
                               आप देखिये , ऐश्वर्य मिलता है घर मिलता है , लेकिन अगर घर में पत्नी न हो , बहन न हो ,माँ न हो तो कैसा घर है | वास्तव में वह लक्ष्मी है | शिव उस के मस्तक पर है | श्वेताबरा  है , सब को मंगलमय रखती है और जब आसुरी शक्तियाँ ध्वस्त करने लगती है तो वह आसुरी शक्तियों पर आरूढ़ होती है , तब वह सिंहवाहिनी होती है , दुर्गा होती है | बड़ी शक्ति है उसमें | प्रारम्भ में संस्कृति ने हमे महत्व दिया , लेकिन समाज ने धीरे -- धीरे हमारा महत्व छीन लिया , कब छीन लिया ? जब आप कमजोर बनी , सिर्फ लक्ष्मी रह गई , सम्पत्ति बन गई |
                                           आप जो नए युग की नारी हैं , आप को बड़ा काम करना है | अपनी शक्ति को पहचानना है | सम्पत्ति होना अस्वीकार कर दो | सामान है क्या आप ? सब आप को सामान मानते है और अगर पति न रहे , तो जैसे खिलौना फेंक देता है बच्चा , ऐसे स्त्री को फेंक देते है | कानून ने हमें बहुत अधिकार दिए है | लेकिन कानून पात्रता नही देगा | पात्रता आप से आएगी | हमारा युग बड़ा कठिन था | हमे लड़ाई लड़नी पड़ी | पुलिस की लाठियों के सामने , गोलियों के सामने खड़े रहे और फिर पढ़ने के लिए चारों ओर भटकते रहे | आप को सब सुविधायें  है | इसलिए आप देश को बनाइए जैसा  आप बनाएगी , वैसा देश बनेगा | तो आप इस भारत की धरती की तरह , जैसे सीता को भूमिजा कहते है , वैसे भूमिजा है आप...आप सीता बनिये | मान लिया कि  राम रक्षा करने गये थे | वन में चले गये थे कि रक्षा करेंगे , लेकिन रावण के यहाँ  रक्षा कौन करता था सीता की ? वह तो राम लक्ष्मण नहीं थे | उन्हें पता नही था | ढूढ़ रहे थे | सीता ने अपने वर्चस्व से , अपनी शक्ति से अपनी रक्षा की | रावण उसको अपने प्रासाद में भवन में नही ले जा सका | अशोक वाटिका में रखा |
                               और उसकी शक्ति देखिये | अग्नि परीक्षा दी उसने | और उसका तेजस्वी रूप देखिये | जब राम ने कहा , लव -कुश बड़े हो और राम , लव -कुश से हार गये तो उन्होंने सीता से कहा कि अब अयोध्या की महारानी होइए और अयोध्या चलिए | सीता ने इनकार कर दिया | राम ने कहा प्रजा के सामने सिर्फ परीक्षा दे दीजिये | अस्वीकार कर दिया उसने |
                          कोई माता अपने पुत्रो के सामने परीक्षा देती है ? अपने सतीत्व के लिए ? नहीं देती है | तो सीता ने अस्वीकार कर दिया और राम ने जब बहुत कहा तो सीता ने धरती में प्रवेश कर लिया |
अब उस की शक्ति देखिये | वो चाहती तो राम के हाथ पाँव जोडती , अयोध्या की रानी हो जाती , लेकिन उसने नहीं होना चाहा | ऐसा पति जो किसी के कहने से ,पति का कर्तव्य भूल जाए , उसके साथ क्यों जायेगी ? नहीं गई वह | सो मैं बार -बार कहती हूँ | सीता बनो , तुम्हारा उत्तर होना चाहिए , हम तो सीता है ही हम तो धरती की पुत्री है | स्वंय शक्ति रखती है | वह आप का घर बनाती है | आपको सुख देती है | आपको मंगलमय बनाती है | कितने रूपों में पुरुष को सहयोग देती है | वह पति को कितना आत्मत्याग सिखाती है | पुत्र को कितना तेजस्वी बनाती है | वह तो मानव जीवन की निर्मात्री है | जीवन की श्रुति है वह | बड़े से बड़ा व्यक्ति भी उसकी गोद में आएगा , चाहे राम हो कृष्ण हो बुद्ध हो, किसी माता की गोद में किसी माता के आंचल की छाया में बड़ा होगा | उसकी आँखों के सपने अपने आप को देखेगा | वह उसे अंगुली पकड कर चलना सिखाएगी | आप अपने को छोटा मत समझिये |
                               आपके भी कुछ कर्तव्य है | हमने देखा , आधुनिका बनने के लिए , लडकियाँ घंटे भर घुंघराले बाल बनाएगी | आँखों में काजल लगाएगी , होठ रंगेगी , चेहरा रंगेगी | एक जगह हम गये तो रंगे चेहरे वाली लडकियाँ सामने बैठी थीं | हमने कहा , पहले मुँह धोकर आओ , हम तो पहचान नही पाती आप को |
                               आदमी तो आदमी है न | वह आपको कठपुतली बना देता है | आप लड़के को कोई खिलौना दे दीजिये तोड़कर देखेगा | लेकिन लड़की घर बसाएगी , गृहस्थी बसाएगी , घरौदा बनाएगी , उसमें गुड्डे -- गुड्डी बैठाएगी | उनका व्याह रचाएगी , यानी यह सब कुछ जानती है | छोटी लड़की भी | और लड़के को देखिये तो उसकी टांग तोड़ देगा , सर फोड़ देगा | पुरुष का स्वभाव ही आक्रामक है | अगर स्त्री उसे संयम नहीं सिखाएगी तो फिर वह संयम से नही रहता || हमारे युग के एक बड़े व्यक्ति ने कहा कि राष्ट्र स्वतंत्र नहीं होगा , यदि उसकी नारी जो शक्ति है वो स्वतंत्र नही होगी | जितनी कला है वह आप के पास है | जितनी विद्या है , वह आप के पास है | आप तितली या कठपुतली मत बनिये | साक्षात शक्ति स्वरूपा हैं आप | आप शक्ति को पहचानिए और देश को बनाइए | मेरी मंगलकामना आपके साथ है |





शनिवार, 3 नवंबर 2012

रिश्ते.....







                                                         तन की आवश्यकता तो कहीं भी पूरी की जा सकती है...किन्तु इंसान भावनात्मक तौर पर जुड़ना चाहता है...वर्ना हर रिश्ता समझौता है..! नज़दीक रह कर भी आदमी आदमी को नहीं पहचानता...हाथ मिलते हैं....शरीर भी मिलते हैं......पर दिल.....???
दिल नहीं मिलते !
                                                अगर फूल में रंगत हो, कोमलता हो, ताज़गी हो लेकिन खुशबू न हो...तो वो फूल कैसा....????
                     संबंधों में मधुरता और एक-दुसरे के लिए सम्मान ज़रूरी है तभी सम्बन्ध फलते फूलते हैं और ताउम्र चलते हैं...! झूठ, दंभ, दिखावा, बड़बोलापन और अपशब्दता किसी भी सम्बन्ध को बेवक्त और बेमौत मारने के लिए काफी है....!!



बुधवार, 17 अक्टूबर 2012

उम्मीद.......






वादे भी कीजिये  ओ मुकर कर के देखिये 
जब बात न बने तो बदल कर के देखिये  !


माना  कि प्रेम पलता  नहीं  सबके  दिलों  में
फिर भी किसी को दिल में बसा कर के देखिये !

जब आएगा सैलाब तो सब बह ही जायेगा

धारा को अपनी ओर पलट कर के  देखिये !

इस दिल में रह रहा था जो अब तक उधार में

उस  को  ही  खरीदार  बना  कर  के  देखिये !

जो ख्वाब तेरे टूट गए.....फिर  न  जुड़ेंगे....
कुछेक  नए  ख्वाब संजो कर तो  देखिये...!

जन्नत कहीं नहीं है...वो दिल में ही पल रही

कुछ हंसिये खुद भी और हंसा कर के देखिये !

मिलने की अब उम्मीद न करिये रकीब से 

आँखों  में  उसका  नूर बसा  कर के देखिये...!





सोमवार, 8 अक्टूबर 2012

स्वप्न......






जागते हुए सोना
सोते हुए जागना
बस ऐसी ही होती है
हमारे मन की स्थिति...! 
सूरज कब उगा ,
किधर से उगा...
और कब,
किस तरफ डूब गया...!
चाँद निकला तो...
मगर रौशनी थी या नहीं...
देख ही नहीं पाते अक्सर हम ही...!
रौशनी दिखी भी कभी... 
तो कहीं दूर.......
किसी दूसरे के आँगन में...!
सूरज चमका तो ज़रूर...
मगर किसी दूसरे की आँखों में...!!
हमारी बोझिल आँखें 
अपने आप में,
अपने आस-पास में...
रौशनी देख ही नहीं पातीं...!
चाँद की शीतलता 
जो दूसरे के आँगन में पाई...
अपने ही आँगन में वो..
हमें छू तक नहीं पाती...!!
वास्तविकता तो ये है कि 
जो नजदीक का देख सके... 
हमने वो दृष्टि ही नहीं पाई...!!
नज़रें अपने से कहीं दूर 
क्षितिज में गड़ाए बैठे रहते हैं..
वहाँ बादलों में उभरते हुए चेहरों में 
सब नजर आता है...
कुछ स्मृतियाँ उभरती हैं...
कुछ ध्वनि-प्रतिध्वनि भी 
सुनाई देने लगती है 
और फिर नजदीक के 
सारे चेहरे लुप्त हो जाते हैं..
पास की कोई ध्वनि सुन सकें 
वही कान बहरे हो जाते हैं.....!
जो रिश्ते...
जो सम्बन्ध...
हमीं ने बनाए थे कभी  
उन्हीं से बू आने लगती है 
और सबके सब अपनी ही 
आँखों में धूमिल पड़ जाते हैं..!
उनका अपनत्व विलुप्त हो जाता है 
हमारे लिए ही...
और अपने ख्वाब ही 
सच्चे लगने लगते हैं हमें...!
फिर जन्म होता है 
एक नए सूरज का...
एक नए चाँद और सितारों का...!
मगर कब तक...??
अपनी ही बनायीं पूरी एक दुनिया
एक तरह से हम खुद ही  
नकार देते हैं पूरी तरह से....!
अपने ख़्वाबों की दुनिया ही 
हमें दैविक लगने लगती है...!
आस-पास की स्तुतियाँ
मंत्रोच्चारण भी...
उस दैविक मंगलाचरण के आगे 
फीके पड़ जाते हैं...!
और फिर इस संसार और संबंधों से 
मुंह मोड़ना बहुत आसान हो जाता है !
क्यूँ कि वहाँ...
दूर में बहुत कुछ है 
जो हमें लुभाता है !
एक दिवास्वप्न जो 
जीने का एहसास तो दिलाता है
लेकिन जिया नहीं जा सकता...!
बस ऐसे ही.. 
जीवन बीत जाता है हम सबका...!
और फिर इसका सारा दोष 
हम अक्सर दूसरों को...
परिस्थितियों को...
कभी किस्मत को...
और कुछ न मिले तो... 
भगवान को ही दे देते हैं...!!!






"जो बीबी से करते हैं प्यार.......वो प्रेस्टिज से कैसे करें इनकार.."






कल मूवी हॉल में.. 
एक बहुत पुराना विज्ञापन देखा
प्रेस्टीज प्रेशर कुकर का ...
सुनते ही कुछ लाइनें मन में 
ट्यूब लाईट की तरह जल उठीं....!

शायद आपको भी याद हो....!!
समय और परिस्थिति के साथ 
बहुत सी बातों के मायने बदल जाते हैं...!!


"जो बीबी से करते हैं प्यार
वो प्रेस्टिज से कैसे करें इनकार.."

शायद इसीलिए आज तक
तुम प्रेस्टिज नहीं खरीद पाए...!
यूँ तो मेरे बारे में हमेशा ही 
झूठ बोला है तुमने सभी से
लेकिन ये एक झूठ... 
तुम खुद से भी नहीं बोल पाए...!!




शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2012

सन्नाटा......




आधी रात की तन्हाई....
बड़ी अजीब होती है !
बस ! हम ही हम
यहाँ कोई दूसरा नहीं...!
खुद कहते हम...
सुनते भी हम..!
एक अजीब सा सन्नाटा 
भीतर-बाहर...!
शरीर-मन का अजीब सा संयोग...!
जो सिर्फ 
और सिर्फ हम ही 
महसूस कर सकते हैं...!
और कोई नहीं...!
कोई भी नहीं.......