बड़ा ही विस्तृत विषय है ये प्यार !!!
न जाने कितने लोग लिख गए हैं...
न जाने कितने लोग लिख रहे हैं...
न जाने कितने और लोग लिखेंगे...
इस 'भावना' पर....!!
एक अथाह...अनन्त....सरल...
और उतना ही दुरूह....!
लेकिन प्यार की सुन्दरता....
किसी भी तरह
बखानी ही नहीं जा सकती.
कितना भी कोई कह दे....
कम ही लगता है.....
हर किसी को अपना प्यार
दूसरे से ज्यादा गहरा लगता है !
और खूबसूरत भी.....
क्यूँ न हो....!
प्यार है ही ऐसा....!!
लेकिन मुसीबत आ खड़ी होती है
जब लोग आपस में ही
प्यार की गहराई नापने लगते हैं..
अपनी छोड़ कर...
दूसरे की समर्पण की भावना
ताकने लगते हैं....!
क्यूँ भाई तुम कितने समर्पित हो
अपने प्यार के प्रति...??
अगर आपस में प्यार है तो...
'समर्पण' के बिना हो ही नहीं सकता....!
और ऐसी बातें भी
तभी उठती हैं जब देखने वाला
'समर्पण' के लिए केवल
सामने वाले की तरफ देखते रहता है...!
खुद भी समर्पित होना है प्यार में
स्वयं ही भूल जाता है.....!!
प्यार कभी भी एकतरफा नहीं होता....!
चाहे वो राधा-श्याम का हो,
सीता-राम का हो,
या मीरा-श्याम का...!
उदाहरण के लिए बातें
हम इन्हीं लोगों की करते हैं..
लेकिन इन चरित्रों से जुडी
प्यार की भावना को नहीं देख पाते हैं !
प्यार में कोई कुछ पा के खोता है
तो कोई कुछ खो के पा जाता है....!!
किसने क्या पाया और किसने क्या खोया..
ये खोने और पाने वाला ही जानता है...!
समर्पण भी तभी सार्थक है
जब सामने वाला उसके काबिल हो....
वर्ना कुपात्र को किया गया
समर्पण भी व्यर्थ ही जाता है.....!
एकतरफा प्यार भी....
ज्यादा दिन चलता नहीं है.....!
प्यार में न हो ईमानदारी दोनों तरफ
तो प्यार भी फलता नहीं है....!!
प्यार करने की बातें
कोई कितनी भी करे...
लेकिन प्रेम में सच्ची साझेदारी....
शायद ही कोई करे...!
कुछ न कुछ छुपाव-दुराव
खुद रखते हैं बीच में
और फिर वही लोग
बातें भी करते हैं.....
"unconditional love "
और प्यार में "समर्पण" की !
कभी खुद के दिल में भी झांकें....
थोड़ा खुद को भी टटोलें..
क्या कभी खुद को भी
दूसरे के प्रति समर्पित किया है
पूरी ईमानदारी के साथ उन्होंने.....???






