हर इंसान की जिन्दगी कुछ तलाशने में ही गुज़र जाती है....वह तलाश कुछ भी,किसी भी चीज़ की हो सकती है....शारीरिक ज़रूरतों की,सांसारिक सुख-सुविधाओं की.मानसिक सुख की,ख़ुशी की,emotional support की, perfect relations की,एक perfect soulmate की, आधात्मिक सुख की, भगवान् की....और भी न जाने क्या-क्या...???
इंसान ही क्यों....इस दुनिया में जो भी आया है....वह चाहे किसी भी रूप में हो,उसका जाना निश्चित है...फिर चाहे शमा हो या परवाना,आग हो या पानी,पत्थर हो या मोम,साधु हो या शैतान,भगवान् हो या इंसान या फिर और भी किसी रूप में इस धरती पर शरीर धारण करके आया हो !! परन्तु जाते-जाते कितना तृप्त और कितना अतृप्त होगा ???...शायद वह खुद नहीं जानता....!!और उस तृप्तता को पाने के लिए हर जगह,हर इंसान,हर रिश्ते में कुछ तलाशता रहता है....शमा को परवाने की तलाश है तो परवाने को शमा की,आग को लहकने के लिए हवा की तलाश है तो पानी को तलाश है किसी नदी या समंदर की,पत्थर को तलाश है कि कोई उसे मूर्ति में ढाले और मोम को तलाश है एक सांचे की जिसमें ढल कर वह शमा की तरह जल उठे,साधु को भगवान् की तलाश है तो शैतान को भगवान् और इंसान दोनों की,भगवान् को भी तलाश है भक्त की और एक इंसान क्या तलाश रहा है...यह वह ज़िंदगी भर नहीं जान पाता...!! कभी लगता है कि सब मिल गया,कभी लगता है कि कहीं कुछ है जो मिलना बाकी है...और इस तरह तलाश जारी रहती है क्योंकि इसका दायरा इतना बड़ा है कि गिनाना मुश्किल है.....शारीरिक सुख हैं तो मानसिक नहीं,सांसारिक सुख है तो आध्यात्मिक नहीं.....!! आध्यात्मिकता की भी अपनी अलग ही तलाश है....और यह तलाश जारी रहती है मृत्यु पर्यंत... और उसके बाद भी.....फिर एक नई जिन्दगी और फिर वही तलाश !!!
लेकिन कब तक.......???





