
कोई ज़रूरी नहीं कि
हर समय कुछ कहा ही जाए !!
हम क्या सोचते हैं?
क्या कहते हैं?
हमारे मन में क्या चल रहा है?
हम जानते हुए भी
अनजाने से हैं सबसे !!
तभी तो जिस पल में
एक-दूसरे को
मन से-
भावनाओं से-
महसूस करना चाहिए...
हम उस अनुभूति को
हल्का कर देते हैं,
कुछ भी ऐसे ही बोल कर!!
सारे शब्द...
बेमानी से हो जाते हैं
ऐसे समय में.
क्यों कि-
भावनाओं के,
अनुभूति के,
और विचारों के स्तर पर
हम अलग-अलग हैं..
फिर-
ये शब्द बीच में
मन को
जोड़ने का काम नहीं कर पाते...
उस समय
ये सारे शब्द बेचारे से लगते हैं..
जो कहते तो कुछ हैं
पर महसूस कुछ और ही कराते हैं.
मन एक हों तो-
इन शब्दों का
हमारे बीच कोई काम नहीं है.
इन शब्दों के घेरे में-
फंसने से घुटन होती है
कहीं तुम्हारे भीतर
और मेरे भीतर भी...
क्योंकि तुम जो महसूस कर रहे हो-
कह नहीं पा रहे हो,
और जो मैं सुन रही हूँ
वह महसूस नहीं कर पा रही हूँ !!!

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